मन दर्पण

शब्द रचना करूं अर्पण,दिखाऊं कैसे तुझे मन दर्पण
पथ विचलित करूं कैसे, कैसे बताऊं मनोरथ समर्पण|
    गतिशील सा परिवर्तन प्रभंजन,रूका हुआ मन आपदा प्रबन्धन
    स्वर्णिम युग सुरभित वाणी, अपरिवर्तित है भाव नियन्त्रण|
तरूण तपस्वी भाषित है, रचना के पावन पृष्ठो में,
छणिक मधुर है छणिक तीव्र है, पक्तिंया कतिपय दृश्यो में|
     कल्पना मार्ग में पथित तुरंग, मनोभावो का विपलव मृदंग
     शून्य प्रकाश में प्रदर्शित व्याकरण, व्योम विशाल के खुलते तोरण|
शब्द रचना करूं अर्पण,दिखाऊं कैसे तुझे मन दर्पण
पथ विचलित करूं कैसे, कैसे बताऊं मनोरथ समर्पण|
   
       रचनाकार-प्रभात जोशी'प्रभु'

Comments

Popular posts from this blog

परिवर्तन

शब्द

हिमालय की कलम से ( ग्राम कीमू, कपकोट की कहानी )