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बस ऐसे ही तुम पढ़ लेना

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ख्वाबो के सब्जबाग काल्पनिक दुनिया को हंसते हुऐ परिभाषित कर रहे थे| दिवास्वपन मदमस्त होकर कल्पनाओ की उड़ान भर रहे थे | कल्पनाऐ असीमित होकर व्योम की ओर अग्रसर थी, मेरे मन का युवा ख्वाबो में उड़ान भरकर अहंकारी हाथी के रूप में बस्ती को छिन्न भिन्न कर रहा था|  अकस्मात ही सत्य रूपी महावत ने मेरे पांव में अलौकिक बेड़ियां डाल दी| मैं कुछ समझ पाता इससे पहले ही नींद खुल गयी और सुबह मुझसे कर्म को परिभाषित करने की इच्छा करने लगी|         मैं समझ चुका था सत्यता मेरी बचकानी मानसिकता और लड़कपन से काफी अलग थी| To be continuous........                                                                                          प्रभात जोशी "प्रभु"