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हिन्दी

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आज चौदह सितम्बर 2019 'हिन्दी दिवस' के उपलक्ष्य पर शब्दों के गगन यान कल्पनाओं के अम्बर मे प्रक्षेपित होने की रणनीति मे जुट गए हैं |  आज ही के दिन 1949 को हिन्दी को राज भाषा के रूप में अपनाया गया था | एक तथ्य यह भी है कि 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी के पुरोधा व्यौहार राजेन्द्र सिंह का 50-वां जन्मदिन था, जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए |               "स्टेटस सिंबल" का हव्वा इस कदर ज़न गण की मानसिकता पर प्रभावित हो रहा है है कि #हम लोग देश में ही विदेशी बनकर घूम रहे हैं |वक्तव्यों, वार्तालाप में हिन्दी अब मिश्रित होने लगी है, अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग संवाद को चटपटा कर रहा है। हिन्दी का नमस्कार अब अंग्रेजी के 'हाय' की ओर अग्रसर है हिन्दी की हाय तो बुरी लगती है। ...

व्यग्र चिन्तन

अक्समात ही मन के हिमालय से हिमनद पिघलने लगते हैं।   समय अथाह ही  बलवान होता है जो सफलता और असफलता के प्रतिमानों को बदलने में अपनी विशेष भूमिका का निर्वहन करता है। लड़कपन में जो मस्ती के शिगूफे थे उम्र के साथ साथ वह सोचनीय विषय बन जाते है।  उम्र के विशेष दौर में एकाकीपन मुझे लिखने  के लिए प्रेरित करने लगा था। हालाँकि हिंदी कभी मेरा रुचिकर विषय नहीं रहा। बावजूद इसके विचारो   का सैलाब अब शब्दों  सुनामी बनकर तटबंधो को तोड़ने की तैयारी में जुट गया है। मानसिक अंतर्द्वंद ने दिमाग के असंख्य ज्ञान के तुच्छ से हिस्से ने ही मस्तिष्क को दुनिया के कोने कोने में दौड़ाया है।                             हम वार्ता किस सन्दर्भ करे , यदि कभी व्यग्र चिंतन करें तो किस प्रकरण पर करें ? आदि काल से वर्तमान के प् परिपेक्ष्य में , शैस्वास्था से वृद्धावस्था तक, पूर्व से पश्चिम की ओर   एवं उत्तर से दक्षिण की ओर किसी भी देश काल परिस्थिति में सोच के दायरे , जरूरते और चिंतन के विषय भी रूप परिवर्तित क...