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ज़िन्दगी और ये प्लानिंग की नौकरी

ज़िन्दगी और ये प्लानिंग की नौकरी विद्यार्थी जीवन -युवावस्था के नये दौर में कल्पना शक्ति अपने उफान पर उत्पादित होती है| इतिहास पढने का शौक कभी रहा नही पर इतिहास बनाने का जज्बा हमेशा चर्मोत्कर्ष में जीवंत है। मजबूरियों  से ही सही इतिहास को जानकर दूसरे की गलतियों एवं सफलताओं से सीखने का अवसर प्राप्त करने से  खुद को संशोधित, परिष्कृत करने में सहायता प्राप्त हुई है | वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना ही काफ़ी नहीं है, शायद ऐसा होता तो एम बी टी (मुहम्मद बिन तुगलक)  इतिहास का सबसे सफल सुल्तान होता |               किसी शायर ने कहा है कि फितूर होते हैं हर उम्र के जुदा-जुदा, खिलौने, माशूका, रुतबा और खुदा |                          देश काल और परिस्थितियाँ  हमेशा भिन्न होती है खिलौनों का शौक भी बचपन से ही डिजिटल रहा, 1998 के उस दौर से हाथ में विडियो गेम रहा | आते आते 2002 तक contra, mario, allaudin की जै...

हिमालय की कलम से ( ग्राम कीमू, कपकोट की कहानी )

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                                  हिमालय की कलम से ( ग्राम कीमू, कपकोट की कहानी )                             शब्दो का हिमनद अति हिमपात के कारण बहने को तैयार है और भावनाओं की झील में विस्फोट होने को उत्साहित है। आज हिमालय लिख रहा है अपने अनछुऐ पहलुओ को उजागर करने के लिऐ जो हिमनदो के इर्द र्गिद घूमते हुऐ दबे हुऐ हैं। हिरामणी, नामिक ग्लेशियर का पड़ोसी समुद्रतल से तकरीबन 2500 मी की ऊंचाई पर दानपुर (कपकोट,बागेश्वर ) परगने के बिचला दानपुर क्षेत्र का सबसे ऊंचाई पर स्थित ग्राम कीमू अपनी सुन्दरता के साथ ही परम्परा के लिऐ भी जाना जाता है। जिला मुख्यालय से तकरीबन 75 किमी सड़क दूरी पर एवं 4 किमी के दुलर्भ पैदल मार्ग को चुनौती देता यह गांव अपनी खुबसूरती और विरासत को सम्भाले हुऐ है। पधान को ओग देने की ब्रिटिश  कालीन परम्परा नऐ प्रारूपो में आज भी जीवन्त हैं। नवम्बर से फरवरी तक प्रकृति का जब मन करता है इसे बर्फ की चादर ओढ़ा देती है। जेठ क...

हिन्दी

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आज चौदह सितम्बर 2019 'हिन्दी दिवस' के उपलक्ष्य पर शब्दों के गगन यान कल्पनाओं के अम्बर मे प्रक्षेपित होने की रणनीति मे जुट गए हैं |  आज ही के दिन 1949 को हिन्दी को राज भाषा के रूप में अपनाया गया था | एक तथ्य यह भी है कि 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी के पुरोधा व्यौहार राजेन्द्र सिंह का 50-वां जन्मदिन था, जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए |               "स्टेटस सिंबल" का हव्वा इस कदर ज़न गण की मानसिकता पर प्रभावित हो रहा है है कि #हम लोग देश में ही विदेशी बनकर घूम रहे हैं |वक्तव्यों, वार्तालाप में हिन्दी अब मिश्रित होने लगी है, अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग संवाद को चटपटा कर रहा है। हिन्दी का नमस्कार अब अंग्रेजी के 'हाय' की ओर अग्रसर है हिन्दी की हाय तो बुरी लगती है। ...

व्यग्र चिन्तन

अक्समात ही मन के हिमालय से हिमनद पिघलने लगते हैं।   समय अथाह ही  बलवान होता है जो सफलता और असफलता के प्रतिमानों को बदलने में अपनी विशेष भूमिका का निर्वहन करता है। लड़कपन में जो मस्ती के शिगूफे थे उम्र के साथ साथ वह सोचनीय विषय बन जाते है।  उम्र के विशेष दौर में एकाकीपन मुझे लिखने  के लिए प्रेरित करने लगा था। हालाँकि हिंदी कभी मेरा रुचिकर विषय नहीं रहा। बावजूद इसके विचारो   का सैलाब अब शब्दों  सुनामी बनकर तटबंधो को तोड़ने की तैयारी में जुट गया है। मानसिक अंतर्द्वंद ने दिमाग के असंख्य ज्ञान के तुच्छ से हिस्से ने ही मस्तिष्क को दुनिया के कोने कोने में दौड़ाया है।                             हम वार्ता किस सन्दर्भ करे , यदि कभी व्यग्र चिंतन करें तो किस प्रकरण पर करें ? आदि काल से वर्तमान के प् परिपेक्ष्य में , शैस्वास्था से वृद्धावस्था तक, पूर्व से पश्चिम की ओर   एवं उत्तर से दक्षिण की ओर किसी भी देश काल परिस्थिति में सोच के दायरे , जरूरते और चिंतन के विषय भी रूप परिवर्तित क...

बस ऐसे ही तुम पढ़ लेना

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ख्वाबो के सब्जबाग काल्पनिक दुनिया को हंसते हुऐ परिभाषित कर रहे थे| दिवास्वपन मदमस्त होकर कल्पनाओ की उड़ान भर रहे थे | कल्पनाऐ असीमित होकर व्योम की ओर अग्रसर थी, मेरे मन का युवा ख्वाबो में उड़ान भरकर अहंकारी हाथी के रूप में बस्ती को छिन्न भिन्न कर रहा था|  अकस्मात ही सत्य रूपी महावत ने मेरे पांव में अलौकिक बेड़ियां डाल दी| मैं कुछ समझ पाता इससे पहले ही नींद खुल गयी और सुबह मुझसे कर्म को परिभाषित करने की इच्छा करने लगी|         मैं समझ चुका था सत्यता मेरी बचकानी मानसिकता और लड़कपन से काफी अलग थी| To be continuous........                                                                                          प्रभात जोशी "प्रभु"

सफलता का सूत्र

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व्यक्ति का निर्णय निजी हो सकता है किन्तु व्यक्तित्व का निर्णय देश, काल एवं परिस्थिति के अनुरुप होता है| जीवन में सफलता के अग्र बिन्दु को प्राप्त करने के लिए सैद्धान्तिक से अधिक व्वहारिक निर्णय आवश्यक होते है| केवल अभिव्यक्ति को विचारो या शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने से सफलता को प्राप्त नही किया जा सकता बल्कि आवश्यक है  वह सकारात्मक सोच एवं दृढ़ संकल्प जो एक स्थितिज ऊर्जा को रचनात्मक गतिद ऊर्जा में परिवर्तित कर एक स्वच्छ प्रतिबिम्बित पुंज निर्माण की कार्यदायी संस्था बन पाये|                                       प्रभात जोशी"प्रभु"

अामा और यादें

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विद्यार्थी जीवन/बेरोजगारी के उस दौर में 1000 का वो नोट होठों की मुस्कुराहट को उज्जवल करता था| आज अकारण ही मस्तिष्ककी यादों ने मन को भाव विभोर ओर प्रज्ज्वलित कर दिया| सोचकर अच्छा लगता है उन पुरानी यादों में एक नादानी सी छिपी होती थी|          स्मृति के दायरे आमा की यादों की परिक्रमा कर रहे हैं| ओ परभु  तु कभाड़ जन जाये बाट में ठुल डढा़की छू| पढ़ाई से लेकर ग्राम विकास अधिकारी प्रशिक्षण तक के उस दौर में एक खुराक आमा की डांट की होती थी| कभी फुर्सत मिलती तो आमा परभु(प्रभु) को टाइमपास के लिए भी हड़का देती थी|         गांव के घर का पटांगड़ अब सूना लगता है रौनक तो आमा की हाकाहाक (हल्ले) थी| बड़ी देर में समझ आया उम्र अब नादानी के उस दौर से काफी आगे निकल गयी है| पर जब आमा का वो नोट और आग्क रव्ट (आग की रोटी) ख्याल में आता है मन फिर लड़कपन में खो जाता है|    अब न आमा है ना हजार का नोट बस यादें है और आशीर्वाद जो उस लड़कपन को जीवन्त रखे हुऐ हैं|                       ...