व्यग्र चिन्तन
अक्समात ही मन के हिमालय से हिमनद पिघलने लगते हैं। समय अथाह ही बलवान होता है जो सफलता और असफलता के प्रतिमानों को बदलने में अपनी विशेष भूमिका का निर्वहन करता है। लड़कपन में जो मस्ती के शिगूफे थे उम्र के साथ साथ वह सोचनीय विषय बन जाते है। उम्र के विशेष दौर में एकाकीपन मुझे लिखने के लिए प्रेरित करने लगा था। हालाँकि हिंदी कभी मेरा रुचिकर विषय नहीं रहा। बावजूद इसके विचारो का सैलाब अब शब्दों सुनामी बनकर तटबंधो को तोड़ने की तैयारी में जुट गया है। मानसिक अंतर्द्वंद ने दिमाग के असंख्य ज्ञान के तुच्छ से हिस्से ने ही मस्तिष्क को दुनिया के कोने कोने में दौड़ाया है। हम वार्ता किस सन्दर्भ करे , यदि कभी व्यग्र चिंतन करें तो किस प्रकरण पर करें ? आदि काल से वर्तमान के प् परिपेक्ष्य में , शैस्वास्था से वृद्धावस्था तक, पूर्व से पश्चिम की ओर एवं उत्तर से दक्षिण की ओर किसी भी देश काल परिस्थिति में सोच के दायरे , जरूरते और चिंतन के विषय भी रूप परिवर्तित क...