व्यग्र चिन्तन

अक्समात ही मन के हिमालय से हिमनद पिघलने लगते हैं।   समय अथाह ही  बलवान होता है जो सफलता और असफलता के प्रतिमानों को बदलने में अपनी विशेष भूमिका का निर्वहन करता है। लड़कपन में जो मस्ती के शिगूफे थे उम्र के साथ साथ वह सोचनीय विषय बन जाते है।  उम्र के विशेष दौर में एकाकीपन मुझे लिखने  के लिए प्रेरित करने लगा था। हालाँकि हिंदी कभी मेरा रुचिकर विषय नहीं रहा। बावजूद इसके विचारो   का सैलाब अब शब्दों सुनामी बनकर तटबंधो को तोड़ने की तैयारी में जुट गया है। मानसिक अंतर्द्वंद ने दिमाग के असंख्य ज्ञान के तुच्छ से हिस्से ने ही मस्तिष्क को दुनिया के कोने कोने में दौड़ाया है। 
                           हम वार्ता किस सन्दर्भ करे , यदि कभी व्यग्र चिंतन करें तो किस प्रकरण पर करें ? आदि काल से वर्तमान के प् परिपेक्ष्य में , शैस्वास्था से वृद्धावस्था तक, पूर्व से पश्चिम की ओर  एवं उत्तर से दक्षिण की ओर किसी भी देश काल परिस्थिति में सोच के दायरे , जरूरते और चिंतन के विषय भी रूप परिवर्तित कर लेते हैं। वस्तुतः मानव जीवन में चिंतन एक ऐसा विषय जो आवश्यक भी है।  यही एक ऐसा गुण है जो मानवमात्र को प्राणी जगत में श्रेष्ट करता है।  अपनी पहुंच से बहार जाकर सोचने की क्षमता  तरक्की और विकास के द्धार को खोला है एवं नवाचार  परिसीमाओं को विस्तृत किया है। 
                            हमारे वार्तालाप के केंद्र बिंदु में समाहित व्यग्र चिंतन की आवशयकता सभी के लिए है जो सफलता और असफलता के प्रतिमान तय करती है।  राजा यदि प्रजा की चिंता करेगा तो शासन व्यवस्था में सुधर होगा , छात्र यदि अध्ययन की चिंता करेगा  तो परिणाम बेहतर  होंगे। इसी तरह अपने कार्य   क्षेत्र में किया गए चिंतन को कार्य की बेहतरी को गति  देने में सहायक माना जा सकता है। बावजूद इसके चिंतन ही चिंतन अकर्मण्यता को बढ़ाकर अवसाद ग्रस्त करने में वित्तपोषण भी करता है।  
                          उपरोक्त विवेचन से स्वतः ही कहा जा सकता है कि सकारात्मकता को  गति देने  प्रभावी चिंतन आवश्यक है जो खुद की प्रतिभा  जानने एवं परखने एवं आत्मपरीक्षण  के लिए आवश्यक है। 




प्रभात जोशी "प्रभु "

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