अामा और यादें

विद्यार्थी जीवन/बेरोजगारी के उस दौर में 1000 का वो नोट होठों की मुस्कुराहट को उज्जवल करता था| आज अकारण ही मस्तिष्ककी यादों ने मन को भाव विभोर ओर प्रज्ज्वलित कर दिया| सोचकर अच्छा लगता है उन पुरानी यादों में एक नादानी सी छिपी होती थी|
         स्मृति के दायरे आमा की यादों की परिक्रमा कर रहे हैं| ओ परभु  तु कभाड़ जन जाये बाट में ठुल डढा़की छू|
पढ़ाई से लेकर ग्राम विकास अधिकारी प्रशिक्षण तक के उस दौर में एक खुराक आमा की डांट की होती थी| कभी फुर्सत मिलती तो आमा परभु(प्रभु) को टाइमपास के लिए भी हड़का देती थी|
        गांव के घर का पटांगड़ अब सूना लगता है रौनक तो आमा की हाकाहाक (हल्ले) थी| बड़ी देर में समझ आया उम्र अब नादानी के उस दौर से काफी आगे निकल गयी है| पर जब आमा का वो नोट और आग्क रव्ट (आग की रोटी) ख्याल में आता है मन फिर लड़कपन में खो जाता है|
   अब न आमा है ना हजार का नोट बस यादें है और आशीर्वाद जो उस लड़कपन को जीवन्त रखे हुऐ हैं|








                                           भवदीय- प्रभात जोशी"प्रभु"
          

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